कुछ इस तरह कन्याओं ने मनाई अक्षय तृतीया

मऊरानीपुर (झांसी)आज सुबह से ही लडकियों में गुड्डा गुडियों को बनाकर उनका श्रृगांर आपस में शादी कराने में लगी रही। इसके अलावा सुबह से पानी में देवल(चना) को भिगोंया गया शाम को मंदिरों में पूजा अर्चना के बाद देवल बांटकर परिवार की सुख शांति समृद्व होने की कामनायें की गई।

कटरा निवासी सुरभी अग्रवाल, छिपयांत निवासी शिवानी, अनु, मनु, तनु, लाडली, नैन्सी आदि ने गुड्डा गुडियों को सजाकर शादी कर देवल बांटे।

इस मौके पर श्रीमति शोभा अग्रवाल ,सौम्या दमेले, रानू सेठ, ज्योति अग्रवाल चौकदमेला निवासी ज्योति सोनी ने बताया कि हिंदू परम्पराओं में अक्षय तृतीया बैशाख मास के शुक्ल पक्ष का तीसरा दिन बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है मान्यता है कि इस दिन किये कामों से कोई हानि नही होती।

वह हमेशा बने रहते है इसे अबूझ मुहुर्त भी कहते है, अबूझ मुहुर्त यानी इस दिन कोई भी काम ग्रह स्थिती और शुभ मुहुर्त देखकर नही किया जाता पूरा दिन शुभ मुहुर्त माना गया है।

अक्षय तृतीया यानी जिसका कभी क्षरण न हो जो हमेशा कायम रहे यह कहा जाता है कि इसके पीछे कई पौराणिक मान्यातायें है यह तिथी भगवान परशुराम के जन्म से लेकर गंगा के धरती पर आने और कृष्ण सुदामा के मिलन तक से जुडी है, अक्षय तृतीया को सबसे ज्यादा भगवान बिष्णु को छठे अवतार भगवान परशुराम के जन्मोत्सव के रुप में मनाया जाता है परशुराम उन आठ पौराणिक पात्रों मे से एक है जिन्हैं अमरता का वरदान मिला हुआ है इसी अमरता के कारण इस तिथी को अक्ष्य कहते है क्योंकि परशुराम भगवान अक्षय है इनके जन्म के अलावा भी कुछ और पौराणिक घटनायें है जिनका अक्षय तुतीया पर घटित होना माना जाता है अक्षय तुतीया को श्रेष्ठ तिथियों में से एक माना जाता है, ज्योतिष ग्रन्थ एवं पौराणिक मान्यातायें कहती है कि इस दिन जो भी शुभ कार्य शुरु होता है उसका सबसे अच्छा फल इसी तिथी को मिलता है आज भी ग्रामीण इलाकों में सबसे ज्यादा विवाह इसी तिथी पर आयोजित होते है।

रिपोर्ट- रवि अग्रवाल रठा

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