झांसी में कचरे की तरह सिमट गया इन बच्चों का आने वाला भविष्य, कोई नहीं समाजसेवी?

गुरसरांय (झांसी न्यूज़)। बच्चे जो भगवान का रूप होते हैं, और माता पिता के लाडले होते हैं,हर माता पिता अपने बच्चों को एक अच्छी ऊंचाइयों तक पहुंचाना चाहते हैं,की जिससे उनका और उनके बच्चे का नाम रोशन हो, हर माता पिता अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, कि उनका बच्चा पढ़ लिखकर उनका सपना साकार कर सके,कुछ गरीब माता पिता तेज धूप में कड़ी मेहनत करके अपने बच्चों को पढ़ाते हैं,और अपने आने वाले सपने संजोते हैं, लेकिन माता पिता की गरीबी के कारण यह बच्चे जो देश के आने बाले भविष्य है, जब बह ही सड़को पर कचड़ा और भीख मांगते हुए दिखेंगे,तो कैसे उन बच्चों का आने बाला भविष्य संबरेंगा, तो चलिए आपको ले चलते हैं झांसी के कस्बे गुरसरांय की उस जगह पर जहां से यह बच्चे कचड़ा बीनना शुरू करते हैं।

यह बच्चे कॉलेज चौराहा से होते हुए कटरा बाजार और मोदी चौराहा तक जाते है ,और फिर इसके बाद गरौठा चौराहे के कबाड़े पर कबाड़ा बेच देते हैं , कुछ लोग आपस मे चर्चा कर कहते हैं कि यह बच्चे उनके होंगे जो सड़क पर जीवन यापन कर रहे हैं, लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि इनके माता पिता बहुत ही गरीब होंगे, जिसकी बजह से यह बच्चे सड़क पर कचड़ा बीनकर और भीख मांगकर गुजारा कर रहे हैं, यह बच्चे मोदी चौराहा कॉलेज चौराहा बाजार सहित कई ऐसी जगह है ,जहां से यह भीख मांगकर और कचड़ा बीनकर अपना और अपने परिवार का गुजारा करते हैं, सुबह होते ही यह बच्चे फिर से भीख मांगकर और कचड़ा बीनकर बही दौर दोहराते है, कई बर्षो से बच्चे यही काम कर रहे हैं।

क्या बोले बच्चे?

जब इन बच्चों से पूछो तो यह कहते हैं कि तुम यह सब क्यों करते हो, तो उन बच्चों ने बताया कि यह कचड़ा बीनकर और भीख मांगकर आराम से 200 से 300 रुपये प्रतिदिन कमा लेते हैं। बो कहते हैं कि मजबूरी है, कोई काम नही है ,इसके अलाबा क्या करे?

उत्तर प्रदेश में ऐसे कई ऐसे जिले और कई गांव है, जहां पर 1000 की संख्या में यह बच्चे सड़को पर कचड़ा बीनते हुए और भीख मांगते हुए दिखाई देंगे, लेकिन गरीबी के कारण गरीब बच्चों के माता-पिता मेहनत करके भी बमुश्किल से घर का खर्च कैसे चलाते हैं, यह गरीब परिवार ही जानता है, गरीब परिवार से पूछो जो सड़कों पर एक त्रिपाल के नीचे सर्दी हो या गर्मी बरसात हो या आंधी हर समय से लड़कर बह अपना जीवन यापन कर रहे हैं, इस तेज धूप के थपेड़ों से लड़ते हुए मेहनत करके करीब 100 से ₹200 प्रतिदिन कमाते हैं, लेकिन 100 या ₹200 में एक गरीब परिवार अपना और अपने बच्चों का पेट कैसे पालते हैं, वह गरीब परिवार ही जानता है, लेकिन ऐसे में प्रश्न यह उठते हैं?

क्या इन गरीब परिवारों के बच्चों की जिंदगी ऐसे ही सड़कों पर भीख मांगते हुए और कचड़ा बीनते हुए गुजर जाएगी? या फिर कोई संस्था या कोई अधिकारी और सरकार इन बच्चों और ऐसे गरीब परिवारों को कोई सुविधा मुहैया करा पाएगी? या फिर गरीब माता पिता ऐसे ही घर के खर्च की पूर्ति के लिए अपने बच्चों का आने बाला भविष्य बर्बाद होते हुए देखते रहेंगे? क्या इन बच्चों का आने बाला भविष्य बन पाएगा? या नही क्या कोई संस्था या कोई अधिकारी या फिर सरकार इनकी सुध ले पाएगी या नहीं? क्या यह बच्चे अपने खर्च और अपना परिवार का खर्च कचरा बीन कर और भीख मांग कर उठाते रहेंगे?यह तो आने बाला बक्त ही बताएगा कि सरकार ,अधिकारी, और संस्थाएं, इन गरीब परिवारों के प्रति क्या कदम उठाएंगी।

रिपोर्ट :अजय वर्मा

 

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