राष्ट्रद्रोह का कानून क्यों खत्म करना चाहती है कांग्रेस ? जानें क्या है इसके पीछे की योजना

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नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में अपनी जीत को और भी मजबूत करने के लिए कांग्रेस पार्टी ने मंगलवार को अपना घोषणापत्र जारी किया। जिसका नाम ‘जन-आवाज’ रखा गया। इस घोषणापत्र में कांग्रेस ने गरीब, बेरोजगार, किसान और आम आदमी समेत शिक्षा को लेकर कई गंभीर मुद्दे उठाते हुए जनता से इसका निराकरण करने का वादा किया है। इसमें कांग्रेस ने जनता से पक्का वादा करते हुए यह भी कहा है कि ‘अबकी बार 72 हजार’ . यानी सभी की न्यूनतम मासिक आय कम से कम 12000 ₹ जरुर की जाएगी। और यह कांग्रेस की पहली गारंटी है, लेकिन जैसे ही कांग्रेस का घोषणा पत्र जारी हुआ, तो विपक्षी दल ने उन्हें एक दूसरे के मुद्दे पर घेर लिया। और यह मुद्दा था राष्ट्रद्रोह का कानून वाला मुद्दा।

 जिसका कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र के 30 वें कॉलम मैं जिक्र किया था। यह जिक्र था आईपीसी की धारा 124 ए का। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं, कि आखिर आईपीसी की धारा 124 ए क्या है? और आखिर कांग्रेस इसे क्यों बदलना चाहती है? और क्यों इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस के ऊपर बम फोड़ रही है. क्या इससे कांग्रेसका नुकसान हो गया होगा? क्या कांग्रेस ने एक बड़ी गलती कर दी है। या फिर भाजपा हर बार की तरह विपक्ष होने के नाते कांग्रेसी पर बेमतलब प्रहार कर रही है।

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क्या है धारा 124 ए यानी राष्ट्रद्रोह का कानून

धारा 124 ए भारतीय दंड संहिता यानी इंडियन पेनल कोड (आईपीसी) की धारा है। इस धारा में राष्ट्रद्रोह को परिभाषित किया गया है। जिसमें बताया गया है कि यदि कोई देश की एकता अखंडता को नुकसान पहुंचाने का काम करता है , तो इस पर यह धारा लागू होती है। इस कानून की परिभाषा में यह भी शामिल है, कि यदि कोई अपने लेख, कार्टून या अभिव्यक्ति के जरिए देश की एकता और अखंडता या इसके विरोध में कोई कृत्य करता है. तो यह धारा उस पर लागू होती है।

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राष्ट्रद्रोह करने की सजा क्या है ?

यदि कोई राष्ट्रद्रोह की धारा 124 ए का उल्लंघन करता है, तो उसे 3 साल से लेकर उम्र कैद की सजा का प्रावधान है. इसमें देश के खिलाफ लिखने और बोलने पर भी पाबंदी है. जिसमें पोस्टर बनाना, कार्टून बनाना, वीडियो बनाना लेख लिखना आदि शामिल है. सार्वजनिक रूप से देश की गरिमा को क्षति पहुंचाना या देश के प्रतीक चिन्हों के साथ खिलवाड़ करना आदि भी इसका उल्लंघन माना जाता है।

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राष्ट्रद्रोह कानून का इतिहास क्या है?

राष्ट्रद्रोह कानून आज का नहीं बल्कि बरसों पुराना है. यह अंग्रेजों के शासन काल से लागू होता चला आ रहा है. ब्रिटिश सरकार ने इसे सन 1860 में लागू किया था. जब भारतीय, अंग्रेजों के शासन के खिलाफ मुंह खोलते या अपनी अभिव्यक्ति जाहिर करते, लेख लिखते या ऐसा कोई भी काम करते जिससे ब्रिटिश सरकार की खिलाफत मानी जाती. वह उस पर राष्ट्रद्रोह का कानून लागू करते थे. 1870 में इसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में शामिल कर लिया गया.

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अब तक इन लोगों को मिल चुकी राष्ट्रद्रोह की सजा

स्वतंत्र भारत से पहले राष्ट्रद्रोह के कानून के तहत देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक पर यह कार्यवाही की गई थी. यह कार्यवाही ब्रिटिश सरकार ने की थी। इन लोगों द्वारा सरकार के खिलाफ अपना लेख लिखा था. जिसके बाद ब्रिटिश सरकार ने यह कार्यवाही अमल में लाई थी। 1908 में लोकमान्य तिलक को इस कानून के तहत 6 साल की सजा सुनाई गई थी।

हालांकि स्वतंत्र भारत में इसमें समय समय पर काफी बदलाव होते रहे हैं। 1965 में सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेशित किया था, कि प्रशासन के खिलाफ की जाने वाली नारेबाजी को राष्ट्रद्रोह ना माना जाए। इस दौरान लोग अपनी अभिव्यक्ति भी जाहिर कर सकते हैं। हाल ही के चर्चित मामलों में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी, हार्दिक पटेल,  कन्हैया कुमार आदि को इस कानून के तहत सजा सुनाई गई।

धारा 124 ए पर घोषणा पत्र में क्या कहा कांग्रेड ने

कांग्रेस द्वारा मंगलवार को जारी किया गया घोषणा पत्र के 30 वें कॉलम में इस धारा का जिक्र करते हुए कहा गया है कि

“भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए, जो राष्ट्रद्रोह इसे ताल्लुक रखती है. इसका वेजा दुरूपयोग हुआ है। इसका संविधान में पहले से ही कानून है। इसलिए इसकी महत्ता समाप्त हो जाती है”.

क्यों बंद की जाए राष्ट्रद्रोह की धारा 124 ए

राष्ट्रद्रोह की धारा 124 ए को बीते कई सालों से बंद किए जाने की मांग चली आ रही है। इसके पीछे जानकारों का तर्क यह है कि इसके लिए पहले से ही संविधान की धारा 19(1) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम लगाने की कोशिश की है। ऐसे में यह बेवजह है, और इसका दुरुपयोग किया जाने लगा है। इसलिए इसे बंद कर देना ही उचित है।

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