पद्मिनी : बुन्देलखण्ड की वीरांगना राजकुमारी की वीरता की कहानी

पद्मिनी (पदमिनी) : बुन्देलखण्ड की वीरांगना राजकुमारी की वीरता की कहानी, जिसने खुद को झुकने नहीं दिया। पहले  हजारों की फौज के सामने अपनी छोटी सी टुकड़ी के साथ  वीरतापूर्ण युद्ध किया , और फिर जब सब नस्त नाबूत हो गया और बात इज्जत पर आ गई तो बुंदेलखंड की लज्जा को बचाने के लिए राजकुमारी ने अपनी सखियों के साथ बेतवा नदी पर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

बुंदेलखंड के अपने इतिहास में कई वीर और वीरांगना पैदा हुए हैं। आल्हा ऊदल से लेकर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तक के नाम सभी ने सुने हैं, और उनकी वीरता की कहानी आज भी सुनने को मिलती है। लेकिन कुछ ऐसे वीर और वीरांगनाएं भी बुंदेलखंड की धरती पर पैदा हुए हैं। जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। आइए जानते हैं बुंदेलखंड की एक और वीरांगना राजकुमारी पद्मिनी (पदमिनी) के बारे में।

पद्मिनी की कहानी

झांसी के मोठ क्षेत्र उस गांव में बना चबूतरा, जहां पद्मिनी की गढ़ी थी
झांसी के मोठ क्षेत्र उस गांव में बना चबूतरा, जहां पद्मिनी की गढ़ी थी

बुंदेलखण्ड की धरती ने लगभग सभी जातियों को पनपने का अवसर दिया है। बात मध्यकालीन है जब झांसी और आसपास घने जंगल हुआ करते थे, बुंदेली में जंगल को दांग कहा जाता है। इन्ही दांग में अपने राज्य चलाने वाले क्षत्रिय दांगी कहे जाते थे। ऐसी ही एक दांगी रियासत थी- विरहटा । विरहटा वर्तमान में झांसी जिले के मोठ तहसील क्षेत्रांतर्गत चिरगांव से कुछ मील दूरी पर नदी बेतवा के किनारे स्थित है ।

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वीरांगना के साथ सुंदरी भी थी पद्मिनी

मध्यकाल मे यहाँ एक दांगी रियासत थी। यहाँ के राजा की पुत्री थीं – पद्मिनी (पदमिनी)। अपने नाम की तरह ही राजकुमारी बहुत सुन्दर थीं । राजकुमारी युद्ध कला में पारंगत थीं । तीर कमान और तलवार चलाना बचपने से सीख रखा था। पिता के राजकाज में हाथ बंटाकर प्रजा के दुःख सुख में साथ देतीं थी।उस समय आतताई अपने साम्राज्य क्षेत्र को बढ़ाने में लगे थे।

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राजकुमारी पद्मिनी के सौंदर्य पर मोहित हुआ सरदार

यहाँ से करीब 35 किमी दूरी पर ऐरच नगरी थी जो व्यापारिक और सांस्कृतिक रूप में समृद्ध थी। दुश्मन सरदार एक भारी सेना लेकर ऐरच को जीतने के लिए जा रहा था।रास्ते में उसे पदमिनी राजकुमारी के सौदर्य की सूचना मिली तो उसने विरहटा के राजा को संदेश भेजा कि यदि अपने राज्य की सलामती चाहते हो तो राजकुमारी को सखियों सहित उसके खेमे में भेज दो।

वीरांगना पद्मिनी ने दिखाई वीरता

बेतवा नदी का किनारा
बेतवा नदी का किनारा

बुंदेली राजा इस बात से कहां सहमत हो सकता था।उसने अपनी बेटी को यह बात बताई। राजकुमारी पदमिनी ने तलवार उठा ली। लेकिन विशाल आतताइयों सेना के सामने विरहटा की छोटी सी सेना कहा टिक पाती। लेकिन राजकुमारी ने अपनी सखियों के साथ तीर और तलवारों के प्रहारों से आततायियों की सेना के होश उङा दिए । लेकिन तोपों के प्रहारों से विरहटा की गढी को तहस नहस कर दिया गया।राजकुमारी के सभी परिजन मारे गए।

राजकुमारी ने जब देखा कि अब कोई नहीं बचा और दुश्मन से बचना मुश्किल है तो राजकुमारी ने अपनी सखियों के साथ वही बेतवा नदी के किनारे बने एक कुण्ड में कूदकर अपने सतीत्व की रक्षा की।

कहाँ है यह जगह ?

उक्त विरहटा गांव में आज भी वो कुण्ड मौजूद है जिसमें कभी पानी नहीं सूखता । गढी के अवशेषों को अब एक मंदिर का रूप दे दिया है। बेतवा नदी से घिरा होने के चलते बहुत खूबसूरत प्राकृतिक वातावरण से भरा है यह स्थान। यहाँ तक आप झांसी से 35 किमी की दूरी पर चिरगांव होते हुए पहुँच सकते हैं । यहाँ के ऊपर वृंदावन लाल वर्मा ने विराटा की पदमिनी नाम से एक उपन्यास भी लिखा है, उपन्यास पढकर इस स्थान पर जायेंगे तो और अधिक श्रद्धा भाव जगेगा।


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Dr. Chitragupt Shrivastava

डॉ चित्रगुप्त श्रीवास्तव बुन्देलखण्ड के इतिहास में विशेष जानकारी रखते हैं। यह इतिहासकार के साथ लेखक और पत्रकार भी हैं। बुन्देलखण्ड से जुड़ी तमाम परंपराओं इतिहास और कई गुप्त जानकारियों को खंगालने और उसको लोगों तक पहुँचाने में रुचि रखते हैं। आपने बुंदेलखंड के इतिहास विषय पर पीएचडी किया है।

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