आल्हा ऊदल की लड़ाई कीं रहस्मयी बातें, उनकी बीरता की कहानी

अपने पराक्रम और वीरता के बल पर पूरे भारतवर्ष में अपनी वीर गाथा रचने वाले आल्हा ऊदल की लड़ाई की कहानियां हर कोई जानना चाहता है। हर कोई जानना चाहता है, कि आल्हा उदल कौन थे? यूं तो आल्हा ऊदल की पूरी कहानी आपको बुंदेलखंड के गांव की चौपालों पर मिलने वाले बुजुर्ग सुनाते नजर आएंगे।

लेकिन यहां हम आपको उनकी वीरता और लड़ाई के रोचक तथ्य बताने जा रहे हैं। आल्हा ऊदल ने माधवगढ, महोबा, पथरीगढ़ समेत कई लड़ाई लड़ी है। अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए बुंदेलखंड के वीर सपूतों ने पृथ्वीराज चौहान तक से लड़ाई लड़ी। आइए जानते हैं आल्हा ऊदल की लड़ाई के कुछ रहस्यमई तथ्य।

12 साल की उम्र में लिया पिता की मौत का बदला

आल्हा खंड में आल्हा उदल की लड़ाई की तमाम घटनाओं का जिक्र है। शुरुआत में उन्होंने मांडो की लड़ाई लड़ी। कहा जाता है मांडो के राजा कारिंगा ने आल्हा ऊदल के पिता जक्षराज-बच्छराज को मरवा कर उनकी खोपड़ी कोल्हू में डलवा दी थी। आल्हा के भाई उदल को जब इसके बारे में जानकारी लगी। तो उन्होंने पिता की मौत का बदला लिया। खास बात यह है कि जब उनकी उम्र मात्र 12 साल की थी।

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आल्हा ऊदल की लड़ाई पथरीगढ़

आल्हा ऊदल ने दूसरी लड़ाई तब लड़ी थी। जब पथरीगढ़ के राजा ने आल्हा की पत्नी मछला का हरण कर लिया था। इसके बाद तमाम खोजबीन की गई। और जब पता चला कि आल्हा की पत्नी का हरण पथरीगढ़ के राजा जुझार सिंह ने किया है। तब आल्हा ऊदल ने पथरीगढ़ के राजा जुझार सिंह से युद्ध लड़ा। इस दौरान जुझार सिंह ने आल्हा ऊदल की कुलदेवी को मना कर आल्हा ऊदल की सभी सेना को पत्थर का बना दिया था। इसके बाद आल्हा को अपने पुत्र की बलि भी चलानी पड़ी।

पृथ्वीराज चौहान से भी लड़े आल्हा-ऊदल

तीसरी बड़ी लड़ाई आल्हा उदल उदल ने पृथ्वीराज चौहान से लड़ी थी। 11 वीं सदी में आल्हा ऊदल ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए पृथ्वीराज चौहान से भीषण युद्ध किया।

आल्हा का कुछ ऐसा जादू है की सुनने वालों के बाजू फड़कने लगते हैं-

रन में दपक -दप बोले तलवार, पन-पन-पन-पन तीर बोलत है,

कह-कह कहे अगिनिया बाण,कट-कट मुंड गिरे

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आल्हा-उदल का किस्सा वैसे तो किसी भी अन्य वीरो के किस्से की ही तरह ही है, मगर जब “जगनिक” का यह वीरगीतात्मक काव्य प्रसिद्ध हुआ तो उत्तर भारत के गांव-गांव में आल्हा उदल का नाम सुनाई देने लगा । लोक गीतों का ही कमाल है। की आल्हा-उदल की वीरता की कहानियाँ , किंवदंतियों में बदल गई। फिर ये कहानियां बुंदेलखंड से निकलकर आसपास के इलाकों में भी फ़ैल गई और इन दोनों को अजर-अमर कर दिया।

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