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क्रिसमस विशेष : एक ही थे जीसस और इशु, रहस्मयी 16 साल का राज

क्रिसमस विशेष : एक ही थे जीसस और इशु, रहस्मयी 16 साल का राज

विश्व इतिहास के महानतम व्यक्तित्व में एक जीसस या ईशा की जीवन का एक बड़ा कालखंड ऐसा भी है जिसके बारे में बाइबल सहित कई प्राचीन ग्रंथ में कोई जिक्र नहीं है. 12 वर्ष की आयु तक उनकी गतिविधियों का उल्लेख बाइबिल में मिलता है, जब उन्हें यरुशलम में 3 दिन तक रोककर पूजा स्थलों में काफी उपदेशको के बीच बैठे, उनकी सुनते और उनसे प्रश्न करते हुए पाया गया । इसके बाद 13 से 29 साल के जीसस के जीवन के बारे में कही कोई उल्लेख नहीं मिलता । जीसस के जीवन की इन रहस्यमई बरसो को ईसाई जगत कि मैं “साइलेंट इयर्स’ ‘लास्ट इयर्स’ या ‘मिसिंग ईयर्स’ कहा जाता है । उसके बाद जीसस ने 36 वर्ष की उम्र में यरूशलेम लौटकर यूहन्ना से दीक्षा ली, और 40 दिनों के बाद धार्मिक शिक्षा देने लगे ।अंततः 33 साल की उम्र में क्रूस पर लटका दिया गया।

1887 ईस वी में रूसी विद्वान और खोजकर्ता नोटोविच ने पहली बार जीसस के लॉस्ट ईयर की खोज की और इस रहस्यमय कालखंड में उनके भारत में रहने का रहस्योद्घाटन किया था । कश्मीर भ्रमण के दौरान जोजिला दर्रे के समीप एक बौद्ध मठ में नोटोविच की मुलाकात एक बौद्ध भिक्षु से हुई थी । जिसने उन्हें बोधिसत्व प्राप्त एक ऐसे संत के बारे में बताया जिसका नाम ईशा था। बातचीत के बाद नोटोविच ने जीसस और इशु के जीवन में कई समानताएं रेखांकित की ।उसने लद्दाख के लेह मार्ग पर स्थित प्राचीन होम्स बौद्ध आश्रम में रखी गई पुस्तकों के अध्ययन के बाद ‘द लाइफ ऑफ़ संत ईस’ नामक पुस्तक लिखी . इस बेहद चर्चित किताब के अनुसार इस्त्र्रा्यल के राजा सुलेमान के समय से ही भारत और इस्त्र्रा्ल के बीच घनिष्ठ व्यापार संबंध थे । भारत लौटने वाले व्यापारियों ने भारत के ज्ञान की प्रसिद्धि के किस्से दूर दूर तक फैलए थे । उनके से प्रभावित होकर जीसस ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य बिना किसी को बताए सिल्क रूट से भारत आए और सिल्क रूट पर स्थित आश्रम में 13 से 29 वर्ष तक की उम्र तक रह कर बौद्ध धर्म तथा संस्कृत और पाली भाषा की शिक्षा दी उन्होंने संस्कृत में अपना नाम यजुर्वेद के मंत्र ईश्वर का प्रतीक शब्द है।

साभार : ध्रुव गुप्ता (पूर्व आईपीएस एवं संस्कृतिकर्मी)

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