जिसके व्यक्तित्व पर एक दो नहीं पूरी 10-10 किताब में लिखी गई हों। जाहिर है वह व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का धनी जरूर रहा होगा। यदि आपने इतिहास के पन्ने पलट कर देखे होंगे। तो आपको जरूर लाला हरदयाल का नाम याद होगा। 19वीं सदी में लाला हरदयाल पर करीब 10 किताबें लिखी गई। आखिर क्या कारण है की लेखकों ने अपनी कलम की स्याही उनके जीवन पर खर्च की। आइए जानते हैं लाला हरदयाल के जीवन को, और लाला हरदयाल की जीवनी।

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लाला हरदयाल की जीवनी

लाला हरदयाल का जन्म 14 अक्टूबर 1984 में दिल्ली के पंजाबी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम गौरी दयाल माथुर था। वह अपने माता पिता की 7 संतानों में से 6 नंबर के थे। उन्होंने अपनी पढ़ाई लाहौर और उसके बाद उच्च शिक्षा दिल्ली से ली। दिल्ली में उन्होंने तमाम युवाओं का दल बनाकर अंग्रेजी सरकार से मुकाबला किया। यही नहीं उन्होंने इस दल में लाला लाजपत राय जैसे युवकों को भी शामिल किया। 1905 में संस्कृत की उच्च शिक्षा लेने के लिए वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी चले गए।

इसके पहले उन्होंने संस्कृत की बैचलर शिक्षा दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज से ली। और संस्कृत की उच्च शिक्षा पंजाबी यूनिवर्सिटी से ली। इसके बाद वह 1960 में वापस भारत आ गए। और यहीं से शुरू हुआ लाला हरदयाल का वह जीवन, जिससे लाला हरदयाल की जीवनी लिखना 10-10 किताबों में भी कम पड़ गई।

लाला हरदयाल के भारत लौटने के बाद

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से अपनी शिष्यवृत्ती त्याग कर, 1960 में भारत लौटने के बाद लाला हरदयाल ने यहां के तमाम अखबारों में अपने कठोर लेख लिखने शुरू कर दिया। जिससे अंग्रेजी सरकार तिलमिला उठी। उन्होंने गदर पार्टी की भी स्थापना की। जिसने अंग्रेजी सरकार में गदर मचा दी। उनके कठोर लेखों से तिल मिलाए अंग्रेज सरकार ने उनके लेखों पर पाबंदी लगा दी। जिस पर लाला लाजपत राय ने उन्हें वापस विदेश चले जाने की सलाह दी।
जिस पर लाला हरदयाल पेरिस चले गए थे। इसके बाद उन्होंने क्यूबा समेत तमाम देशों में जीवन गुजारा। लाला हरदयाल जिस भी देश में पैर रखा वहां के लोगों को आजादी के प्रति जागरूक किया। और वहां रहने वाले भारतीयों को भारत में लगातार अंग्रेजी सरकार द्वारा भारतीयों का किए जा रहे शोषण की जानकारी दी। और उन्हें एकजुट किया। इस दौरान लाला हरदयाल वंदेमातरम पत्रिका के संपादक भी रहे।

लाला हरदयाल की जीवनी पर लिखी गई 10 किताबें

हमारी शैक्षणिक समस्या (1922)
शिक्षा पर विचार/सोच (1969)
हिन्दू दौड़ की सामाजिक जीत
राइटिंग ऑफ़ लाला हरदयाल (1920)
जर्मनी और टर्की के 44 माह
लाला हरदयालजी के स्वाधीन विचार (1922)
अमृत में विष (1922)
आत्म संस्कृति के संकेत (1934)
विश्व धर्मो की झलक
बोधिसत्व सिद्धांत (1970)


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