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रथ सप्तमी कैसे कब और क्यों मनाएं | पूरी जानकारी

रथ सप्तमी कैसे कब और क्यों मनाएं | पूरी जानकारी

माघ माह के शुक्ल पक्ष सप्तमी को रथ सप्तमी का पर्व मनाया जाता है, जो इस वर्ष 24 जनवरी 2018 को है. इसे भानु सप्तमी, सूर्य सप्तमी, अचला सप्तमी, पुत्र सप्तमी इत्यादि नामों से भी जाना जाता है. इसी दिन भगवान सूर्य ने सारे जगत को अपने प्रकाश से आलोकित किया था. इस दिन जो व्यक्ति सूर्य की पूजा करके एक समय फलाहार या मीठा भोजन करता है उसे पूरे सालभर सूर्य पूजा करने का पुण्य बस एक बार में ही प्राप्त हो जाता है.

रथ सप्तमी की महिमा

माघ का पूरा महीना ही बहुत पुण्यदायी है इसे पुण्य मास के नाम से भी जाना जाता है. माघ महीने की अमावस्या, पूर्णिमा और शुक्ल पक्ष की पंचमी और सप्तमी तिथियों का बहुत महत्व है. माघ शुक्ल पक्ष सप्तमी को सालभर की सप्तमी में सर्वश्रेष्ठ माना गया है. इसे दिन व्रत करने से रूप, सौभाग्य और मनोवांछित संतान की प्राप्ति होती है.

अचला रथ सप्तमी व्रत एवं स्नान के नियम

रथ सप्तमी को प्रातः नियम के साथ स्नान करने से उत्तम फल मिलता है. इस दिन पूर्व दिशा की ओर मुंह करके किसी पवित्र नदी अथवा जलाशय में स्नान करना और सूर्य भगवान को दीप दान करना अत्यंत लाभकारी माना गया है. यदि जातक माघ शुक्ल सप्तमी को प्रयागराज इलाहाबाद के संगम में स्नान करता है तो उसे पूरे माघ स्नान का फल मिलता है. सूर्य भगवान की पूजा करके केवल एक ही वक्त फलाहार या मीठा भोजन करें. इस दिन भोजन में तेल और नमक का त्याग करें.

रथ सप्तमी से जुड़ी कथाएं

रथ सप्तमी के संदर्भ में भविष्य पुराण में कथा है कि एक वेश्या ने अपनी जिंदगी में कभी कोई पुण्य का काम नहीं किया था. उसे अपने अंतिम क्षणों का ख्याल आया तो वह गुरु वशिष्ठ के पास गई और उनसे अपनी मुक्ति का उपाय पूछा तो उन्होंने बताया कि माघ मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी जिसे अचला सप्तमी कहते हैं को सूर्य का ध्यान करके स्नान करने और दीप दान करने से महान पुण्य प्राप्त होता है. वेश्या ने गुरु वशिष्ट के बताए अनुसार माघी सप्तमी का व्रत किया जिससे उसे शरीर त्याग करने के बाद इन्द्र की अप्सराओं में शामिल होने का गौरव मिला.

एक अन्य कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के पुत्र शाम्ब ने दुर्वासा ऋषि का कृशकाय शरीर देखकर उनका उपहास किया जिससे क्रोधित होकर ऋषि ने शाम्ब को कुष्ठ होने का श्राप दे दिया. ऋषि के श्राप का प्रभाव होते ही शाम्ब कुष्ठ से ग्रसित हो गए. उपचार से जब कोई लाभ नहीं हुआ तब भगवान श्री कृष्ण ने शाम्ब को सूर्योपासना की सलाह दी जिससे शीघ्र ही शाम्ब को कुष्ठ रोग से छुटकारा मिल गया.

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